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Thursday, 12 May 2016

लप्रेक-3

लप्रेक (लघु प्रेम कथा) 

बरियाती दरबज्जा लागि गेल छै , घरबैया सभ स्वागत करबाक लेल ठाढ़ छथि। सभहक मोन हुलसित अछि मुदा एहि परिधिमे दू टा लोक एहनो जे व्यथित छथि। पहिल छथि बियाही साड़ीमे दुखक वेगके सम्हारने निशा आ दोसर छथि डूगल ग्लास त'र नोर नुकौने मयंक।

काल्हि साँझ दुनू मनोकामना मंदिरमे भेंटल छलथि। मयंक कहने छल-
-की दुनू गोटेक हाथे प्रज्वलित कएल अपन प्रेम दीप काल्हि मिझा जैत?
-हँ मुदा मयंक ,हम अहाँक बिसरि थोड़बे सकैत छी।
-तखन अहाँ हमर प्रेम आ अपन पतिके प्रेम दुनू संग न्याय कोना क' सकै छी?
-नञि मयंक एना नै बाजू।देह नश्वर अछि मुदा प्रेम त' शाश्वत होइत छैक। हम अहाँसँ दैहिक प्रेम नञि केने छी। हम अहाँके आजीवन चाहैत रहब। जखन कखनो प्रेमक तराजू पर अहाँक पक्ष हल्लुक हैत,हम पासङ बनि अहाँके मान राखब।
निशाक एहि उत्तरक आगाँ मयंक निरुत्तर भ' गेल छल।

ब'र निशाक माँग सेनूरसँ भरि रहल अछि आ मयंक डूगल ग्लासक त'रसँ तराजूके पल्लामे पासङ बदलैत देखि रहल अछि।

सुमित मिश्र "गुंजन"
सम्पर्क - 8434810179

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