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Thursday, 26 May 2016

भिखमंगा

कविता

भिखमंगा

एहन पुष्टगर देह
कमेबहीं से नञि
लोक लेहाज उठा लेलहीं
चल आबै छहीं
हाथ पसारने

देखू त'
नीक व्यवसाय बनेने अछि
एकटा गुदरी ओढ़ि
हाथ पसारने
एक-दू टा कैंचा लेल
गोहारि करैत अछि

लोक एनाहिते कहतै
भिखमंगाक कोन पुछारि
ओकर बोलीमे छलकैत
वेदनाके कियो नञि सुनैछ

बुझना जाइछ
गतिशील ट्रेनमे
मनुख गतिहीन अछि
मोन चेतना- शून्य अछि

© सुमित मिश्र ''गुंजन''
करियन ,समस्तीपुर
सम्पर्क - 8434810179

Sunday, 22 May 2016

खुनिया आरि

कविता

खुनिया आरि

त्रेतायुगक बात अछि
लक्ष्मण एकटा रेख बनेने छला
रावणके रोकबाक लेल
सीताके बचेबाक लेल

आइ कलयुगमे
रेख त' वैह अछि
परञ्च
रामके रोकबाक लेल
स्वार्थके बचेबाक लेल

इ रेख ,इ आरि
बनाओल गेल अछि
पुरखाक स्वप्नके
कोरि - कारि क'
एकर आगाँ
मानवता,भाईचारा,प्रेम
सबकिछु हीन अछि

एहि आरिक परंपरा
पीढ़ी दर पीढ़ी
निमाहल जैत
लक्ष्मणके जीबैत
कोनो राम
नञि टपि सकै छथि
इ खुनिया रेखके, आरिके

© सुमित मिश्र ''गुंजन''
करियन, समस्तीपुर
सम्पर्क - 8434810179

Saturday, 21 May 2016

संस्कृतिक तिलांजलि

कविता

संस्कृतिक तिलांजलि

हकार दैत अछि
आधुनिकता
आऊ
फुँकि लिय' सभ्यताके
डाहि लिय' संस्कृतिके

तकरा बाद
ओकरे चिता पर बसाबू
एकटा नव दुनिया
जत्त' नञि होइ
समाजक बंधन
लोक- लेहाज
ओतए केवल क्षुधा होइ
मनुखके मारबाक क्षुधा
मशीन बनेबाक क्षुधा

ठीके सुनलहुँ
हकार अछि
आऊ
सभगोटे अपन संस्कृतिके
तिलांजलि दै छी

© सुमित मिश्र ''गुंजन''
करियन ,समस्तीपुर
सम्पर्क - 8434810179

Friday, 20 May 2016

नारी सशक्तिकरण

कविता

नारी सशक्तिकरण

कखनो माय,बाप या भाइ
त' कखनो पति या संतति
सदिखनि अप्पन पहचान लेल
आन पर आश्रित रहैछ
ओ नारि छै ने

एहि पुरुष प्रधान समाजमे
अपन आस्तित्व हेरैछ
खन काल
समताके भ्रम होइ
परञ्च अगिले क्षण
भ्रम टूटि जाइ छै

करेज पाथर क' लिय'
कियो अहाँके नञि सुनत
अहाँक संग सदिखनि अन्याय भेलए
शाइद आगुओ हैत
त' जागू
अप्पन स्थान
स्वयं सुरक्षित करु
कियो संग नञि देत

एखन त'
नारी सशक्तिकरण
एकटा व्यंग्य बुझाइत अछि।

© सुमित मिश्र ''गुंजन"
करियन ,समस्तीपुर
सम्पर्क - 8434810179

Thursday, 19 May 2016

लप्रेक -5

लप्रेक (लघु प्रेम कथा) - 5

- चलु काया , दुनुगोटे भागिक' बियाह क' लैत छी। इ टोल-समाज हमर प्रेमके नञि सकारि सकैत अछि।
- एना किए कहै छी अनुज। हम कोनो पाप थोड़बे केलहुँए।
- हमर कह'क तात्पर्य इ अछि जे जँ अहाँ चाहैत छी जे अप्पन प्रेम सफल होइ त' आइ इ डेग उठाबहे पड़त।
- की भेलै जँ अहाँ आन जातिक छी? आब सभटा जाति समान अछि ,भेदभाव खतम भ' गेल अछि। अहाँ हमरा चाहैत छी ,हम अहाँक चाहैत छी। जँ हमरा दुनुगोटेक कोनो परेशानी नञि अछि, तखन इ समाजके एहिसँ कोन हर्जा?
- अहाँ बड मासूम छी काया। समाजक छल-परपञ्च नञि बुझैत छी। इ जाति-पाति ,स्वतंत्रता ,समता सभक गप्प केवल सुनैएमे नीक लगैछ ,धरातल पर आइयो धरि इ मान्य नै छै। समाजक ठेकेदार ल'ग इ सभ महत्वहीन अछि।

दुनू एकदोसरक हाथ कसि क पकड़ि लेलक आ अनिश्चित गंतव्य दिस विदा भ' गेल।

© सुमित मिश्र ''गुंजन"
करियन ,समस्तीपुर
सम्पर्क - 8434810179

Tuesday, 17 May 2016

चिरनिद्रा

कविता

चिरनिद्रा

हमर मोनक कोनमे
प्रज्ज्वलित एकटा दीप
मद्धिम इजोत
किछ फरीछ नञि
चिरकाल सँ
अकाइन रहल छी
ककरो पदचाप

जी अकच्छ भ' गेल
आँखिक नोर सुखा गेल
मुदा एखनो धरि
हम दीप जरौने छी
आश बाचल अछि
कियो त' औता
एहि बूढ़के 
सुधि लेब'क लेल

मार बाढ़नि
कियो नञि आयत
मोन होइछ
मिझाक' दीप
सुति रहै छी
चिर निद्रामे।

© सुमित मिश्र ''गुंजन"
करियन ,समस्तीपुर
सम्पर्क - 8434810179

Friday, 13 May 2016

कोठी भरल छै जिनकर

गजल- 16

कोठी भरल छै जिनकर भगवान सब कहैये
शोणित जे अपन जराबए इंसान सब कहैये

भेटए एत्त' नहि सज्जन अगबे दुष्ट सहसह
पाथर करेज जिनकर धनवान सब कहैये

कहलहुँ जे आबि बैसियौ दू क्षण समय माँगै छी
जे अपनो छल नहि कहने ओ आन सब कहैये

केहन रचल इ विधना अजगुत बड बुझाइए
हम सबहक मान राखलहुँ बैमान सब कहैये

केऊ कहितए मीठ बोली त' जिनगी धन्य बुझितौं
इ देखहीं सुमित घरमे दरबान सब कहैये

वर्ण - 19

सुमित मिश्र "गुंजन"
करियन,समस्तीपुर
सम्पर्क - 8434810179